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अक़्ल गहवारा-ए-औहाम हुई जाती है | शाही शायरी
aql gahwara-e-auham hui jati hai

ग़ज़ल

अक़्ल गहवारा-ए-औहाम हुई जाती है

नाज़ मुरादाबादी

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अक़्ल गहवारा-ए-औहाम हुई जाती है
हर तमन्ना मिरी नाकाम हुई जाती है

बाइ'स-ए-शोरिश-ए-कौनैन है इंसाँ की ख़ुदी
बे-ख़ुदी मोरिद-ए-इल्ज़ाम हुई जाती है

अपने परवानों को ऐ शम-ए-मुसलसल न जला
ज़िंदगी वाक़िफ़-ए-अंजाम हुई जाती है

हर रविश पर चमन-ए-दहर में यूँ गुल न खिला
हर नज़र दिल के लिए दाम हुई जाती है

यूँ भी कोई रुख़-ए-रौशन से उठाता है नक़ाब
हर नज़र मोरिद-ए-इल्ज़ाम हुई जाती है

किन फ़ज़ाओं में ज़िया-रेज़ है ऐ मेहर-ए-जमाल
ख़ाना-ए-दिल में मिरे शाम हुई जाती है

हो के मजबूर मुसलसल ग़म-ओ-अंदोह से 'नाज़'
ज़िंदगी ग़र्क़-ए-मय-ओ-जाम हुई जाती है