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आश्नाई ही सही अपनी तलब कोई तो हो | शाही शायरी
aashnai hi sahi apni talab koi to ho

ग़ज़ल

आश्नाई ही सही अपनी तलब कोई तो हो

ख़ालिद जमाल

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आश्नाई ही सही अपनी तलब कोई तो हो
इस दयार-ए-ग़ैर में भी हम-नसब कोई तो हो

शोर घर तक आ गया है कूचा-ओ-बाज़ार का
कुछ तो ऐसा हो यहाँ पे मोहर-ए-लब कोई तो हो

कर्ब-ए-तन्हाई लिए आख़िर कहाँ तक जाइए
हादिसा ही हो अगरचे बे-सबब कोई तो हो

साज़ के टूटे हुए तारों को फिर से जोड़िए
नग़्मा-ए-ख़ुश-रंग या सोज़-ए-तरब कोई तो हो

शाख़ से टूटे हुए पत्ते बहुत मायूस हैं
एक चिंगारी सही उन का भी अब कोई तो हो