आशिक़ी में ख़ामुशी मुमकिन है ना-मुम्किन नहीं
क्या करूँ मुझ से तो ज़ब्त-ए-इल्तिजा मुमकिन नहीं
तालिब-ए-आज़ार इश्क़ और हुस्न आसाइश-पसंद
तू भी हो मेरा शरीक-ए-मुद्दआ' मुमकिन नहीं
मैं जो मिट जाऊँ तो बदलूँ रंग-ओ-बू का पैरहन
आलम-ए-ईजाद में मेरी फ़ना मुमकिन नहीं
हर जगह जल्वे तिरे मेरी नज़र के साथ हैं
मैं पुकारूँ तू न हो जल्वा-नुमा मुमकिन नहीं
साज़िश-ए-दरिया-ओ-साहिल से तो मुमकिन है मगर
मुझ को ये मौजें डुबो दें ना-ख़ुदा मुमकिन नहीं
जिस नज़र को मेरे दर्द-ए-दिल का भी इरफ़ाँ न हो
वो नज़र हो जाए आलम-आश्ना मुमकिन नहीं
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ग़ज़ल
आशिक़ी में ख़ामुशी मुमकिन है ना-मुम्किन नहीं
मख़मूर जालंधरी