आईने के अक्स से गुल सा बदन मैला हुआ
सुब्ह के परतव से रंग-ए-यासमन मैला हुआ
साफ़ ऐ उर्यानी-ए-वहशत कहे देता हूँ मैं
पोस्त खींचूँगा अगर मेरा बदन मैला हुआ
ब'अद मुर्दन भी तकल्लुफ़ से कुदूरत दिल में है
सोहबत-ए-काफ़ूर से अपना बदन मैला हुआ
क्या तिरी तलवार भी मुझ से ग़ुबार-आलूद थी
ख़ून-ए-दिल का रंग क्यूँ ऐ तेग़-ज़न मैला हुआ
शायरों में गुफ़्तुगू आई कुदूरत की बहम
साफ़ कहता हूँ कि अब रंग-ए-सुख़न मैला हुआ
वस्ल की शब बातों बातों में मुकद्दर हो गई
गुफ़तुगू-ए-बोसा से रंग-ए-दहन मैला हुआ
साफ़-गोई से ग़ुबार आईने में आया 'मुनीर'
मेरी बातों से दिल-ए-अहल-ए-सुख़न मैला हुआ
ग़ज़ल
आईने के अक्स से गुल सा बदन मैला हुआ
मुनीर शिकोहाबादी