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उन से इज़हार-ए-शिकायत करूँ या न करूँ | शाही शायरी
un se izhaar-e-shikayat karun ya na karun

ग़ज़ल

उन से इज़हार-ए-शिकायत करूँ या न करूँ

अर्श सहबाई

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उन से इज़हार-ए-शिकायत करूँ या न करूँ
लब पे लर्ज़ां सी है इक बात करूँ या न करूँ

खींच लाए न कहीं फिर ये मोहब्बत की कशिश
जुरअत-ए-तर्क-ए-मुलाक़ात करूँ या न करूँ

मेरी ख़ामोशी-ए-पैहम का उन्हें शिकवा है
ज़िक्र-ए-बे-दर्दी-ए-हालात करूँ या न करूँ

है ग़म-ए-हाल में इंसान परेशाँ-ख़ातिर
फ़िक्र-ए-फ़र्दा की कोई बात करूँ या न करूँ