नाज़ उधर दिल को उड़ा लेने की घातों में रहा
मैं इधर चश्म-ए-सुख़न-गो तिरी बातों में रहा
नातिक़ गुलावठी
नज़र आता नहीं अब घर में वो भी उफ़ रे तन्हाई
इक आईने में पहले आदमी था मेरी सूरत का
नातिक़ गुलावठी
पाबंद-ए-दैर हो के भी भूले नहीं हैं घर
मस्जिद में जा निकलते हैं चोरी-छुपी से हम
नातिक़ गुलावठी
पहली बातें हैं न पहले की मुलाक़ातें हैं
अब दिनों में वो रहा लुत्फ़ न रातों में रहा
नातिक़ गुलावठी
पहुँचाएगा नहीं तू ठिकाने लगाएगा
अब उस गली में ग़ैर को रहबर बनाएँगे
नातिक़ गुलावठी
फिर चाक-दामनी की हमें क़द्र क्यूँ न हो
जब और दूसरा नहीं कोई लिबास पास
नातिक़ गुलावठी
रह के अच्छा भी कुछ भला न हुआ
मैं बुरा हो गया बुरा न हुआ
नातिक़ गुलावठी

