लुत्फ़ तब अमर्द-परस्ती का है बाग़-ए-ख़ुल्द में
पास बैठे जबकि ग़िल्माँ और खड़ी हो हूर दूर
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
मर्तबा माशूक़ का आशिक़ से बाला-दस्त है
ख़ार की जा ज़ेर-ए-पा गुल का मकाँ दस्तार पर
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
निकला न दाग़-ए-दिल से हमारा तो कोई काम
न वो चराग़-ए-दैर न शम-ए-हरम हुआ
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
परवाने के हुज़ूर जलाया न शम्अ' को
बुलबुल के आगे फूल न तोड़ा गुलाब का
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
सताना क़त्ल करना फिर जलाना
वो बे-तालीम क्या क्या जानते हैं
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
सितारे गुम हुए ख़ुर्शीद निकला
अरक़ जब यार ने पोंछा जबीं से
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल
तर्क-ए-शराब भी जो करूँगा तो मोहतसिब
तोडूँगा तेरे सर से पियाला शराब का
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल

