किशन की गोपियाँ की नईं है ये नस्ल
रहें सब गोपियाँ वो नक़्ल ये अस्ल
वली मोहम्मद वली
ख़ूब-रू ख़ूब काम करते हैं
यक निगह में ग़ुलाम करते हैं
वली मोहम्मद वली
आज तेरी भवाँ ने मस्जिद में
होश खोया है हर नमाज़ी का
वली मोहम्मद वली
जामा-ज़ेबों को क्यूँ तजूँ कि मुझे
घेर रखता है दौर दामन का
वली मोहम्मद वली
हर ज़र्रा उस की चश्म में लबरेज़-ए-नूर है
देखा है जिस ने हुस्न-ए-तजल्ली बहार का
वली मोहम्मद वली
गुल हुए ग़र्क़ आब-ए-शबनम में
देख उस साहिब-ए-हया की अदा
वली मोहम्मद वली
दिल-ए-उश्शाक़ क्यूँ न हो रौशन
जब ख़याल-ए-सनम चराग़ हुआ
वली मोहम्मद वली
देखना हर सुब्ह तुझ रुख़्सार का
है मुताला मतला-ए-अनवार का
वली मोहम्मद वली
छुपा हूँ मैं सदा-ए-बाँसुली में
कि ता जानूँ परी-रू की गली में
वली मोहम्मद वली

