नाख़ुदा डूबने वालों की तरफ़ मुड़ के न देख
न करेंगे न किनारों की तमन्ना की है
सालिक लखनवी
मिट चुके जो भी थे तौबा-शिकनी के अस्बाब
अब न मय-ख़ाना न पैमाना न शीशा न सुबू
सालिक लखनवी
मंज़िल न मिली कश्मकश-ए-अहल-ए-नज़र में
इस भीड़ से मैं अपनी नज़र ले के चला हूँ
सालिक लखनवी
आज भी है वही मक़ाम आज भी लब पे उन का नाम
मंज़िल-ए-बे-शुमार-गाम अपने सफ़र को क्या करूँ
सालिक लखनवी
महव यूँ हो गए अल्फ़ाज़-ए-दुआ वक़्त-ए-दुआ
हाथ से ज़र्फ़-ए-तलब छूट गया हो जैसे
सालिक लखनवी
माल-ओ-ज़र अहल-ए-दुवल सामने यूँ गिनते हैं
हम फ़क़ीरों ने न कुछ सर्फ़ किया हो जैसे
सालिक लखनवी
खींच भी लीजिए अच्छा तो है तस्वीर-ए-जुनूँ
आप की बज़्म में क्या जानिए कल हों कि न हों
सालिक लखनवी
खनक जाते हैं जब साग़र तो पहरों कान बजते हैं
अरे तौबा बड़ी तौबा-शिकन आवाज़ होती है
सालिक लखनवी
कही किसी से न रूदाद-ए-ज़िंदगी मैं ने
गुज़ार देने की शय थी गुज़ार दी मैं ने
सालिक लखनवी

