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साबिर ज़फ़र शायरी | शाही शायरी

साबिर ज़फ़र शेर

47 शेर

पहले भी ख़ुदा को मानता था
और अब भी ख़ुदा को मानता हूँ

साबिर ज़फ़र




सुब्ह की सैर की करता हूँ तमन्ना शब भर
दिन निकलता है तो बिस्तर में पड़ा रहता हूँ

साबिर ज़फ़र




शिकायत उस से नहीं अपने-आप से है मुझे
वो बेवफ़ा था तो मैं आस क्यूँ लगा बैठा

साबिर ज़फ़र




शाम से पहले तिरी शाम न होने दूँगा
ज़िंदगी मैं तुझे नाकाम न होने दूँगा

साबिर ज़फ़र




शायरी फूल खिलाने के सिवा कुछ भी नहीं है तो 'ज़फ़र'
बाग़ ही कोई लगाता कि जहाँ खेलते बच्चे जा कर

साबिर ज़फ़र




सर-ए-शाम लुट चुका हूँ सर-ए-आम लुट चुका हूँ
कि डकैत बन चुके हैं कई शहर के सिपाही

साबिर ज़फ़र




नए कपड़े बदल और बाल बना तिरे चाहने वाले और भी हैं
कोई छोड़ गया ये शहर तो क्या तिरे चाहने वाले और भी हैं

साबिर ज़फ़र




मुड़ के जो आ नहीं पाया होगा उस कूचे में जा के 'ज़फ़र'
हम जैसा बे-बस होगा हम जैसा तन्हा होगा

साबिर ज़फ़र




न इंतिज़ार करो इन का ऐ अज़ा-दारो
शहीद जाते हैं जन्नत को घर नहीं आते

साबिर ज़फ़र