तुम्हें तो क़ब्र की मिट्टी भी अब पुकारती है
यहाँ के लोग भी उकताए हैं चले जाओ
साबिर ज़फ़र
शायरी फूल खिलाने के सिवा कुछ भी नहीं है तो 'ज़फ़र'
बाग़ ही कोई लगाता कि जहाँ खेलते बच्चे जा कर
साबिर ज़फ़र
सर-ए-शाम लुट चुका हूँ सर-ए-आम लुट चुका हूँ
कि डकैत बन चुके हैं कई शहर के सिपाही
साबिर ज़फ़र
पहले भी ख़ुदा को मानता था
और अब भी ख़ुदा को मानता हूँ
साबिर ज़फ़र
नज़र से दूर हैं दिल से जुदा न हम हैं न तुम
गिला करें भी तो क्या बे-वफ़ा न हम हैं न तुम
साबिर ज़फ़र
नामा-बर कोई नहीं है तो किसी लहर के हाथ
भेज साहिल की तरफ़ अपनी ख़बर पानी से
साबिर ज़फ़र
नए कपड़े बदल और बाल बना तिरे चाहने वाले और भी हैं
कोई छोड़ गया ये शहर तो क्या तिरे चाहने वाले और भी हैं
साबिर ज़फ़र
न इंतिज़ार करो इन का ऐ अज़ा-दारो
शहीद जाते हैं जन्नत को घर नहीं आते
साबिर ज़फ़र
मुड़ के जो आ नहीं पाया होगा उस कूचे में जा के 'ज़फ़र'
हम जैसा बे-बस होगा हम जैसा तन्हा होगा
साबिर ज़फ़र

