ख़ाक हो कर ही हम पहुँच जाते
उस तरफ़ की मगर हवा भी नहीं
नूह नारवी
कोई यहाँ से चल दिया रौनक़-ए-बाम-ओ-दर नहीं
देख रहा हूँ घर को मैं घर है मगर वो घर नहीं
नूह नारवी
कुछ और बन पड़ी न सवाल-ए-विसाल पर
हैरत से देख कर वो मिरे मुँह को रह गए
नूह नारवी
लैला है न मजनूँ है न शीरीं है न फ़रहाद
अब रह गए हैं आशिक़ ओ माशूक़ में हम आप
नूह नारवी
माजरा-ए-क़ैस मेरे ज़ेहन में महफ़ूज़ है
एक दीवाने से सुनिए एक दीवाने का हाल
नूह नारवी
महफ़िल में तेरी आ के ये बे-आबरू हुए
पहले थे आप आप से तुम तुम से तू हुए
नूह नारवी
मैं कोई हाल-ए-सितम मुँह से कहूँ या न कहूँ
ऐ सितमगर तिरे अंदाज़ कहे देते हैं
नूह नारवी
मौसम-ए-गुल अभी नहीं आया
चल दिए घर में हम लगा कर आग
नूह नारवी
मज़हब-इश्क़-ओ-वफ़ा मुझ को ये देता है सलाह
तू जो काफ़िर नहीं होता तो मुसलमाँ भी न हो
नूह नारवी

