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नूह नारवी शायरी | शाही शायरी

नूह नारवी शेर

87 शेर

ख़ाक हो कर ही हम पहुँच जाते
उस तरफ़ की मगर हवा भी नहीं

नूह नारवी




कोई यहाँ से चल दिया रौनक़-ए-बाम-ओ-दर नहीं
देख रहा हूँ घर को मैं घर है मगर वो घर नहीं

नूह नारवी




कुछ और बन पड़ी न सवाल-ए-विसाल पर
हैरत से देख कर वो मिरे मुँह को रह गए

नूह नारवी




लैला है न मजनूँ है न शीरीं है न फ़रहाद
अब रह गए हैं आशिक़ ओ माशूक़ में हम आप

नूह नारवी




माजरा-ए-क़ैस मेरे ज़ेहन में महफ़ूज़ है
एक दीवाने से सुनिए एक दीवाने का हाल

नूह नारवी




महफ़िल में तेरी आ के ये बे-आबरू हुए
पहले थे आप आप से तुम तुम से तू हुए

नूह नारवी




मैं कोई हाल-ए-सितम मुँह से कहूँ या न कहूँ
ऐ सितमगर तिरे अंदाज़ कहे देते हैं

नूह नारवी




मौसम-ए-गुल अभी नहीं आया
चल दिए घर में हम लगा कर आग

नूह नारवी




मज़हब-इश्क़-ओ-वफ़ा मुझ को ये देता है सलाह
तू जो काफ़िर नहीं होता तो मुसलमाँ भी न हो

नूह नारवी