अहबाब-ओ-अक़ारिब के बरताव कोई देखे
अव्वल तो मुझे गाढ़ा ऊपर से दबाते हैं
मुज़्तर ख़ैराबादी
ऐ बुतो रंज के साथी हो न आराम के तुम
काम ही जब नहीं आते हो तो किस काम के तुम
मुज़्तर ख़ैराबादी
ऐ हिना रंग-ए-मोहब्बत तो है मुझ में भी निहाँ
तेरे धोके में कोई पीस न डाले मुझ को
मुज़्तर ख़ैराबादी
ऐ इश्क़ कहीं ले चल ये दैर-ओ-हरम छूटें
इन दोनों मकानों में झगड़ा नज़र आता है
मुज़्तर ख़ैराबादी
ऐ ख़ुदा दुनिया पे अब क़ब्ज़ा बुतों का चाहिए
एक घर तेरे लिए इन सब ने ख़ाली कर दिया
मुज़्तर ख़ैराबादी
ऐसी क़िस्मत कहाँ कि जाम आता
बू-ए-मय भी इधर नहीं आई
That I would get a goblet it was'nt my fate
now even the whiff of wine does'nt permeate
मुज़्तर ख़ैराबादी
अपने दिल को तिरी आँखों पे फ़िदा करता हूँ
आज बीमार पे बीमार की क़ुर्बानी है
मुज़्तर ख़ैराबादी
अपनी महफ़िल में रक़ीबों को बुलाया उस ने
उन में भी ख़ास उन्हें जिन की ज़रूरत देखी
मुज़्तर ख़ैराबादी
असीर-ए-पंजा-ए-अहद-ए-शबाब कर के मुझे
कहाँ गया मिरा बचपन ख़राब कर के मुझे
मुज़्तर ख़ैराबादी

