मैं संग-ए-रह नहीं जो उठा कर तू फेंक दे
मैं ऐसा मरहला हूँ जो सौ बार आएगा
मुसव्विर सब्ज़वारी
मैं संग-ए-रह हूँ तो ठोकर की ज़द पे आऊँगा
तुम आईना हो तो फिर टूटना ज़रूरी है
मुसव्विर सब्ज़वारी
किया न तर्क-ए-मरासिम पे एहतिजाज उस ने
कि जैसे गुज़रे किसी मंज़िल-ए-नजात से वो
मुसव्विर सब्ज़वारी
किसी को क़िस्सा-ए-पाकी-ए-चश्म याद नहीं
ये आँखें कौन सी बरसात में नहाई थीं
मुसव्विर सब्ज़वारी
आँखें यूँ बरसीं पैराहन भीग गया
तेरे ध्यान में सारा सावन भीग गया
मुसव्विर सब्ज़वारी
कनार-ए-आब हवा जब भी सनसनाती है
नदी में चुपके से इक चीख़ डूब जाती है
मुसव्विर सब्ज़वारी
जो ख़स-ए-बदन था जला बहुत कई निकहतों की तलाश में
मैं तमाम लोगों से मिल चुका तिरी क़ुर्बतों की तलाश में
मुसव्विर सब्ज़वारी
जिसे मैं छू नहीं सकता दिखाई क्यूँ वो देता है
फ़रिश्तों जैसी बस मेरी इबादत देखते रहना
मुसव्विर सब्ज़वारी
इसी उमीद पे जलती हैं दश्त दश्त आँखें
कभी तो आएगा उम्र-ए-ख़राब काट के वो
मुसव्विर सब्ज़वारी

