वो हज़ार दुश्मन-ए-जाँ सही मुझे फिर भी ग़ैर अज़ीज़ है
जिसे ख़ाक-ए-पा तिरी छू गई वो बुरा भी हो तो बुरा नहीं
जिगर मुरादाबादी
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वो ख़लिश जिस से था हंगामा-ए-हस्ती बरपा
वक़्फ़-ए-बेताबी-ए-ख़ामोश हुई जाती है
जिगर मुरादाबादी
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वो थे न मुझ से दूर न मैं उन से दूर था
आता न था नज़र तो नज़र का क़ुसूर था
जिगर मुरादाबादी
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