का'बे में हो या बुत-ख़ाने में होने को तो सर ख़म होता है
होता है जहाँ तू जल्वा-नुमा कुछ और ही आलम होता है
फ़िगार उन्नावी
क़दम क़दम पे दोनों जुर्म-ए-इश्क़ में शरीक हैं
नज़र को बे-ख़ता कहूँ कि दिल को बे-ख़ता कहूँ
फ़िगार उन्नावी
साक़ी ने निगाहों से पिला दी है ग़ज़ब की
रिंदान-ए-अज़ल देखिए कब होश में आएँ
फ़िगार उन्नावी
सर-ए-महफ़िल हमारे दिल को लूटा चश्म-ए-साक़ी ने
उधर तक़दीर गर्दिश में इधर गर्दिश में जाम आया
फ़िगार उन्नावी
शिकस्त-ए-दिल की हर आवाज़ हश्र-आसार होती है
मगर सोई हुई दुनिया कहाँ बेदार होती है
फ़िगार उन्नावी
तिरे ग़म के सामने कुछ ग़म-ए-दो-जहाँ नहीं है
है जहाँ तिरा तसव्वुर वहाँ ईन-ओ-आँ नहीं है
फ़िगार उन्नावी
उन पे क़ुर्बान हर ख़ुशी कर दी
ज़िंदगी नज़्र-ए-ज़िंदगी कर दी
फ़िगार उन्नावी
यक़ीन-ए-वा'दा-ए-फ़र्दा हमें बावर नहीं आता
ज़बाँ से लाख कहिए आप के तेवर नहीं कहते
फ़िगार उन्नावी
आदाब-ए-आशिक़ी से तो हम बे-ख़बर न थे
दीवाने थे ज़रूर मगर इस क़दर न थे
फ़िगार उन्नावी

