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अहमद अता शायरी | शाही शायरी

अहमद अता शेर

28 शेर

ताबीर बताई जा चुकी है
अब आँख को ख़्वाब देखना है

अहमद अता




मैं तेरी रूह में उतरा हुआ मिलूँगा तुझे
और इस तरह कि तुझे कुछ ख़बर नहीं होनी

अहमद अता




मैं तो मिट्टी हो रहा था इश्क़ में लेकिन 'अता'
आ गई मुझ में कहीं से बे-दिमाग़ी 'मीर' की

अहमद अता




मैं उस की आँखों के बारे में कुछ नहीं कहता
उफ़ुक़ से ता-बा-उफ़ुक़ इक जहाँ समझ लीजे

अहमद अता




ना-रसाई ने अजब तौर सिखाए हैं 'अता'
यानी भूले भी नहीं तुम को पुकारा भी नहीं

अहमद अता




फिर कोई दूर हुआ जाता है
फिर कोई दिल के क़रीब आएगा

अहमद अता




सड़क पे बैठ गए देखते हुए दुनिया
और ऐसे तर्क हुई एक ख़ुद-कुशी हम से

अहमद अता




ये तिरा हिज्र अता दर्द अता कर्ब अता
अब 'अता' कैसे जिए तेरी अताओं के बग़ैर

अहमद अता




ये जो रातों को मुझे ख़्वाब नहीं आते 'अता'
इस का मतलब है मिरा यार ख़फ़ा है मुझ से

अहमद अता