नहीं था ध्यान कोई तोड़ते हुए सिगरेट
मैं तुझ को भूल गया छोड़ते हुए सिगरेट
अफ़ज़ल ख़ान
तू रोज़ जिस के तजस्सुस में आ रहा है यहाँ
हज़ार बार बताया है वो नहीं हूँ में
अफ़ज़ल ख़ान
ये भी ख़ुद को हौसला देने का हीला है कि मैं
उँगलियों से लिख रहा हूँ चार सू ला-तक़्नतू
अफ़ज़ल ख़ान
ये जो कुछ लोग ख़यालों में रहा करते हैं
उन का घर-बार भी होता है नहीं भी होता
अफ़ज़ल ख़ान
ये कह दिया है मिरे आँसुओं ने तंग आ कर
हमें ब-वक़्त-ए-ज़रूरत निकालिए साहब
अफ़ज़ल ख़ान
ये मोहब्बत के महल ता'मीर करना छोड़ दे
मैं भी शहज़ादा नहीं हूँ तू भी शहज़ादी नहीं
अफ़ज़ल ख़ान
ये नुक्ता इक क़िस्सा-गो ने मुझ को समझाया
हर किरदार के अंदर एक कहानी होती है
अफ़ज़ल ख़ान
ज़रा ये दूसरा मिस्रा दुरुस्त फ़रमाएँ
मिरे मकान पे लिक्खा है घर बराए-फ़रोख़्त
अफ़ज़ल ख़ान
इक वडेरा कुछ मवेशी ले के बैठा है यहाँ
गाँव की जितनी भी आबादी है आबादी नहीं
अफ़ज़ल ख़ान

