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नया आहंग | शाही शायरी
naya aahang

नज़्म

नया आहंग

अख़्तर-उल-ईमान

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किरामन-कातिबीन आमाल-नामा लिख के ले जाएँ
दिखाएँ ख़ालिक़-ए-कौन-ओ-मकाँ को और समझाएँ

मआनी और लफ़्ज़ों में वो रिश्ता अब नहीं बाक़ी
लुग़त अल्फ़ाज़ का इक ढेर है लफ़्ज़ों पे मत जाना

नया आहंग होता है मुरत्तब लफ़्ज़ ओ मअनी का
मिरे हक़ में अभी कुछ फ़ैसला सादिर न फ़रमाना

मैं जिस दिन आऊँगा ताज़ा लुग़त हमराह लाऊँगा