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ज़ुल्मत ब-हर-मक़ाम ख़िलाफ़-ए-तलब मिली | शाही शायरी
zulmat ba-har-maqam KHilaf-e-talab mili

ग़ज़ल

ज़ुल्मत ब-हर-मक़ाम ख़िलाफ़-ए-तलब मिली

सुलतान रशक

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ज़ुल्मत ब-हर-मक़ाम ख़िलाफ़-ए-तलब मिली
दिन का सुराग़ ढूँडने वालों को शब मिली

ऐ दोस्त तेरे हुस्न-ए-इनायत की ख़ैर हो
ये आगही हमें तिरे ग़म के सबब मिली

याद-ए-ग़ज़ल-रुख़ाँ भी ख़याल-ए-मआ'श भी
आसूदगी दयार-ए-तमन्ना में कब मिली

निकले थे तीरगी के मुसलसल फ़रेब से
जब रौशनी मिली तो हमें जाँ-ब-लब मिली

क़िस्सा तिरी वफ़ा का सितम रोज़गार के
जो शय हमें मिली है वही मुंतख़ब मिली

फुर्सत-तलब मसाइल-ए-अस्र-ए-रवाँ भी थे
लेकिन तिरे ख़याल से फ़ुर्सत ही कब मिली

सुल्तान-'रश्क' ख़ुद से शनासाई के लिए
देखेंगे ख़्वाब फ़ुर्सत-ए-ता'बीर जब मिली