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ज़ोम का ही तो आरिज़ा है मुझे | शाही शायरी
zoam ka hi to aariza hai mujhe

ग़ज़ल

ज़ोम का ही तो आरिज़ा है मुझे

डॉक्टर आज़म

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ज़ोम का ही तो आरिज़ा है मुझे
मेरा मैं ही तो खा गया है मुझे

आतिश ज़ेर-ए-पा ठहरने न दे
अब तो मंज़िल भी रास्ता है मुझे

दर्द तो कम नहीं मगर उस ने
ख़ूगर-ए-ज़ब्त कर दिया है मुझे

ख़ुद-ग़रज़ बेवफ़ा हक़ीर-ओ-फ़क़ीर
उस ने क्या क्या नहीं कहा है मुझे

मैं तलबगार था मसर्रत का
दफ़्तर-ए-रंज-ओ-ग़म मिला है मुझे

मैं ने अशआर कब लिखे 'आज़म'
मेरे अशआर ने लिखा है मुझे