EN اردو
ज़िंदगी की चाहत में ज़िंदगी से मत खेलो | शाही शायरी
zindagi ki chahat mein zindagi se mat khelo

ग़ज़ल

ज़िंदगी की चाहत में ज़िंदगी से मत खेलो

रईस अख़तर

;

ज़िंदगी की चाहत में ज़िंदगी से मत खेलो
रौशनी के दीवानो रौशनी से मत खेलो

ऐ बुतान-ए-बे-परवा कुछ ख़ुदा नहीं हो तुम
प्यार की ख़ुदाई में बंदगी से मत खेलो

आप ही ने कर डाला ज़िंदगी से बेगाना
आप ही तो कहते थे ज़िंदगी से मत खेलो

प्यार दिल का सौदा है अक़्ल दिल की बीमारी
दोस्ती के पर्दे में दोस्ती से मत खेलो

रौशनी की ख़्वाहिश में जल उठे न पैराहन
रौशनी में शो'ले हैं रौशनी से मत खेलो

तुम से कुछ नहीं मतलब हाँ मगर ख़िरद-मंदो
हम जुनूँ-परस्तों की आगही से मत खेलो

नग़्मा-ए-तमन्ना से ख़ून-ए-दिल टपकता है
इशरतों के मतवालो शाइ'री से मत खेलो

मेहर-ओ-माह रहते हैं तीरगी के सीने में
भूल कर 'रईस'-अख़्तर तीरगी से मत खेलो