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ज़िंदगी का मज़ा नहीं मिलता | शाही शायरी
zindagi ka maza nahin milta

ग़ज़ल

ज़िंदगी का मज़ा नहीं मिलता

जावेद लख़नवी

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ज़िंदगी का मज़ा नहीं मिलता
बुत मिले तो ख़ुदा नहीं मिलता

मंज़िल-ए-आख़िरी है क़ब्र मिरी
अब कोई रास्ता नहीं मिलता

ख़ूगर-ए-ज़ुल्म हो गया ऐसा
मुझ को लुत्फ़-ए-वफ़ा नहीं मिलता

निगह-ए-यास से किसे देखूँ
दिल-ए-दर्द-आश्ना नहीं मिलता

बात इतनी न उम्र भर समझे
क्या मिला और क्या नहीं मिलता

जिस को 'जावेद' उस ने खोया है
उसी दिल का पता नहीं मिलता