ज़वाल में भी रहा दिल-नशीं नज़ारा मिरा
मिरे ही साथ गिरा टूट के सितारा मिरा
किसी पे रम्ज़ मिरी बात की खुली ही नहीं
न काम आया मिरे कोई इस्तिआ'रा मिरा
यक़ीं किसी को न आया मैं डूब सकता हूँ
समझ रहे थे अगरचे सभी इशारा मिरा
नदी की तरह किनारा भी काटता हूँ मैं
किसी हिसार में होता नहीं गुज़ारा मिरा
ये बात जान के हैरत नहीं हुई मुझ को
कि मेरी आग से रौशन रहा सितारा मिरा
न रोक पाई मुझे मौजों की कोई साज़िश
रवाँ-दवाँ है अभी झील में शिकारा मिरा
अभी से सम्त बदलने लगा मैं क्यूँ 'आलम'
अभी तो दूर बहुत दूर है किनारा मिरा
ग़ज़ल
ज़वाल में भी रहा दिल-नशीं नज़ारा मिरा
आलम ख़ुर्शीद

