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ज़मीं की आँख से मंज़र कोई उतारते हैं | शाही शायरी
zamin ki aankh se manzar koi utarte hain

ग़ज़ल

ज़मीं की आँख से मंज़र कोई उतारते हैं

अज़ीज़ नबील

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ज़मीं की आँख से मंज़र कोई उतारते हैं
हवा का अक्स चलो रेत पर उभारते हैं

ख़ुद अपने होने का इंकार कर चुके हैं हम
हमारी ज़िंदगी अब दूसरे गुज़ारते हैं

तुम्हारी जीत का तुम को यक़ीन आ जाए
सो हम तुम्हारे लिए बार बार हारते हैं

तलाश है हमें कुछ गुम-शुदा बहारों की
गुज़र चुके हैं जो मौसम उन्हें पुकारते हैं

चमक रहे हैं मिरे ख़ेमा-ए-सुख़न हर-सू
हरीफ़ देखिए शब-ख़ून कैसे मारते हैं

ये कैसी हैरतें दरपेश हैं अज़ीज़-'नबील'
ज़रा ठहरते हैं आसेब-ए-जाँ उतारते हैं