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ज़मीन ख़त्म हुई सर पर आसमाँ न रहा | शाही शायरी
zamin KHatm hui sar par aasman na raha

ग़ज़ल

ज़मीन ख़त्म हुई सर पर आसमाँ न रहा

अबुल हसनात हक़्क़ी

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ज़मीन ख़त्म हुई सर पर आसमाँ न रहा
इसी के साथ कोई ख़ौफ़-ए-इम्तिहाँ न रहा

हमारे इश्क़ का कोई गवाह ज़िंदा नहीं
अज़ाब-ए-हिज्र था अब वो भी दरमियाँ न रहा

तमाम-रात सितारे हमीं को देखते थे
तिलिस्म-ए-ज़ात से निकले तो ये जहाँ न रहा

फ़सील-ए-शहर पे शब-ज़िंदा-दार रहते थे
हुजूम-ए-शहर में ऐसा कोई जवाँ न रहा

ये ज़िंदगी है तो हम ज़िंदगी से बाज़ आए
वो जान क्या कि जहाँ जान का ज़ियाँ न रहा

तमाम लफ़्ज़ हैं तफ़्हीम-ए-नौ पे आमादा
क़यामतों से गुज़रना भी ना-गहाँ न रहा

बस इक सलीक़ा-ए-तजसीम ख़्वाब था मगर अब
सिवाए सीना-ए-सद-चाक कुछ निशाँ न रहा

मियान-ए-गर्दिश-ए-अफ़्लाक तू भी ख़ुश हो जा
मलाल हम को भी ऐ सई-ए-राएगाँ न रहा

ख़राब-ओ-ख़स्ता-ओ-आसूदगान-ए-मंज़िल भी
नवेद-ए-जश्न कि 'हक़्क़ी' का कारवाँ न रहा