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ज़माने को ज़माने की पड़ी है | शाही शायरी
zamane ko zamane ki paDi hai

ग़ज़ल

ज़माने को ज़माने की पड़ी है

अब्दुर्रहमान मोमिन

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ज़माने को ज़माने की पड़ी है
हमें वा'दा निभाने की पड़ी है

ये दुनिया चाँद पर पहुँची हुई है
तुझे लाहौर जाने की पड़ी है

ज़रा देखो इधर मैं जल रहा हूँ
तुम्हें आँसू छुपाने की पड़ी है

फ़साना ही हक़ीक़त बन गया है
हक़ीक़त को फ़साने की पड़ी है

अभी जो शे'र लिक्खा भी नहीं है
अभी से वो सुनाने की पड़ी है

तिरे मेहमान वापस जा रहे हैं
तुझे मेहमान-ख़ाने की पड़ी है

वो तेरे दिल में आ बैठा है 'मोमिन'
तुझे दीवार ढाने की पड़ी है