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ज़बून-ओ-ख़्वार हुई है मिरी जिबिल्लत भी | शाही शायरी
zabun-o-KHwar hui hai meri jibillat bhi

ग़ज़ल

ज़बून-ओ-ख़्वार हुई है मिरी जिबिल्लत भी

अबुल हसनात हक़्क़ी

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ज़बून-ओ-ख़्वार हुई है मिरी जिबिल्लत भी
मिरे नसीब-ओ-विरासत में से इमामत भी

अजब हिरास में था मेरे मौसमों से ग़नीम
कि दे रहा था उसे भागने की मोहलत भी

वो जब भी आया कम-ओ-बेश मुझ पे वार गया
मुझे ये शौक़ कि लाता कभी ज़रूरत भी

मैं अपने ज़हर से वाक़िफ़ हूँ वो समझता नहीं
है मेरे कीसा-ए-सद-काम में शराफ़त भी

समझ रहे थे मैं तन्हा हूँ बे-बसीरत लोग
पस-ए-ग़ुबार चली आ रही थी ख़िल्क़त भी

अगर सलीक़े से कोई गिरफ़्त में लाए
मैं ओढ़ लेता हूँ अक्सर रिदा-ए-तोहमत भी

मैं नींद में था कि सरगोशियों के रक़्स में था
उधर थी नाका-ए-उम्र-ए-रवाँ को उजलत भी

ऐ शहसवार मुझे बादशह बना के तो देख
मैं काट डालूँगा सर-रिश्ता-ए-बग़ावत भी

उसी ने रख दिया मुझ को समेट कर 'हक़्क़ी'
वो जिस के नाम से मुझ को मिली थी शोहरत भी