ज़बून-ओ-ख़्वार हुई है मिरी जिबिल्लत भी
मिरे नसीब-ओ-विरासत में से इमामत भी
अजब हिरास में था मेरे मौसमों से ग़नीम
कि दे रहा था उसे भागने की मोहलत भी
वो जब भी आया कम-ओ-बेश मुझ पे वार गया
मुझे ये शौक़ कि लाता कभी ज़रूरत भी
मैं अपने ज़हर से वाक़िफ़ हूँ वो समझता नहीं
है मेरे कीसा-ए-सद-काम में शराफ़त भी
समझ रहे थे मैं तन्हा हूँ बे-बसीरत लोग
पस-ए-ग़ुबार चली आ रही थी ख़िल्क़त भी
अगर सलीक़े से कोई गिरफ़्त में लाए
मैं ओढ़ लेता हूँ अक्सर रिदा-ए-तोहमत भी
मैं नींद में था कि सरगोशियों के रक़्स में था
उधर थी नाका-ए-उम्र-ए-रवाँ को उजलत भी
ऐ शहसवार मुझे बादशह बना के तो देख
मैं काट डालूँगा सर-रिश्ता-ए-बग़ावत भी
उसी ने रख दिया मुझ को समेट कर 'हक़्क़ी'
वो जिस के नाम से मुझ को मिली थी शोहरत भी
ग़ज़ल
ज़बून-ओ-ख़्वार हुई है मिरी जिबिल्लत भी
अबुल हसनात हक़्क़ी

