ज़ालिम बुतों से आँख लगाई न जाएगी
पत्थर की चोट दिल से उठाई न जाएगी
होने दो हो रहे हैं जो उल्फ़त के तज़्किरे
बिगड़ोगे तुम तो बात बनाई न जाएगी
कह दो ये शम्अ से कि अबस तू है अश्क-बार
पानी से दिल की आग बुझाई न जाएगी
चिलमन हो या नक़ाब हो या पर्दा-ए-हया
सूरत तिरी किसी से छुपाई न जाएगी
मुमकिन है तीर-ए-नाज़ से दिल को बचा भी लूँ
लेकिन नज़र की चोट बचाई न जाएगी
आँखें ख़ुदा ने दी हैं तो देखेंगे हुस्न-ए-यार
कब तक नक़ाब रुख़ से उठाई न जाएगी
तौबा को मुँह लगा के ख़जिल होगे तुम 'जलील'
जाम ओ सुबू से आँख मिलाई न जाएगी
ग़ज़ल
ज़ालिम बुतों से आँख लगाई न जाएगी
जलील मानिकपूरी

