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ज़ाहिद इस राह न आ मस्त हैं मय-ख़्वार कई | शाही शायरी
zahid is rah na aa mast hain mai-KHwar kai

ग़ज़ल

ज़ाहिद इस राह न आ मस्त हैं मय-ख़्वार कई

मीर मोहम्मदी बेदार

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ज़ाहिद इस राह न आ मस्त हैं मय-ख़्वार कई
अभी याँ छीन लिए जुब्बा-ओ-दस्तार कई

संग-दिल कूँ न किसी की हुई अफ़्सोस ख़बर
मर गए सर कूँ पटक कर पस-ए-दीवार कई

ना-तवाँ मुझ सा भला कौन है इंसाफ़ तो कर
चश्म-ए-फ़त्ताँ के तिरे गरचे हैं बीमार कई

दिल की बेताबी से और चश्म की बे-ख़्वाबी से
नज़र आने लगे अब इश्क़ के आसार कई

जूँ ही वो होश-रुबा आ के नुमूदार हुआ
नक़्श-ए-दीवार हुए तालिब-ए-दीदार कई

अब्रू-ओ-चश्म-ओ-निगाह-ओ-मिज़ा हर इक ख़ूँ-ख़्वार
एक दिल है मिरा तिस पर हैं दिल-आज़ार कई

ऐ मसीहा-ए-ज़माँ देख टुक आ कर अहवाल
कि तिरी चश्म के याँ मरते हैं बीमार कई

खींच मत ज़ोर से शाने को तू ऐ मश्शाता
दिल हैं उस ज़ुल्फ़ के बालों में गिरफ़्तार कई

कफ़-ए-पा हैं तिरे सहरा की निशानी 'बेदार'
मर गया तो भी फफूलों में रहे ख़ार कई