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यूँही रंजिश हो और गिला भी यूँही | शाही शायरी
yunhi ranjish ho aur gila bhi yunhi

ग़ज़ल

यूँही रंजिश हो और गिला भी यूँही

क़ाएम चाँदपुरी

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यूँही रंजिश हो और गिला भी यूँही
हो जे हर बात पर ख़फ़ा भी यूँही

कुछ न हम को ही भा गया ये तौर
वाक़ई ये कि है मज़ा भी यूँही

सैद-ए-कंजशक से न हाथ उठा
आ के फँस जाए है हुमा भी यूँही

जूँ उजाड़ा तू घर मिरा ऐ इश्क़
ख़ाना वीरान हो तिरा भी यूँही

क्यूँ न रोऊँ मैं देख ख़ंदा-ए-गुल
कि हँसे था वो बेवफ़ा भी यूँही

अब तलक मेरी ज़ीस्त ने की वफ़ा
बस मैं देखी तिरी जफ़ा भी यूँही

मस-ए-दिल को दिया कर अपने गुदाज़
हाथ चढ़ जा है कीमिया भी यूँही

ये कहाँ और वो गुल किधर 'क़ाएम'
इक हवा बाँधे है सबा भी यूँही