EN اردو
यूँ तो दिल हर कदाम रखता है | शाही शायरी
yun to dil har kadam rakhta hai

ग़ज़ल

यूँ तो दिल हर कदाम रखता है

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

;

यूँ तो दिल हर कदाम रखता है
अहल-ए-दिल होना काम रखता है

कब वो तम-ए-सलाम रखता है
मुझ सा लाखों ग़ुलाम रखता है

इशरत-ए-दो-जहाँ है उस के साथ
जो सुराही-ओ-जाम रखता है

है वही ख़ास बज़्म-ए-दुनिया में
जो मदारा-ए-आम रखता है

दीन-ओ-दुनिया का जो नहीं पाबंद
वो फ़राग़त तमाम रखता है

बुत-परस्तों को कुइ कहे है ज़ुबूँ
कुइ मुसलमाँ को नाम रखता है

हर कोई अपनी फ़हम-ए-नाक़िस में
पुख़्ता सौदा-ए-ख़ाम रखता है

जो किसू को बुरा कहे न 'हुज़ूर'
वही फ़हम-मंद नाम रखता है