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यूँ मुझे तेरी सदा अपनी तरफ़ खींचती है | शाही शायरी
yun mujhe teri sada apni taraf khinchti hai

ग़ज़ल

यूँ मुझे तेरी सदा अपनी तरफ़ खींचती है

शाहिद ज़की

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यूँ मुझे तेरी सदा अपनी तरफ़ खींचती है
जैसे ख़ुशबू को हवा अपनी तरफ़ खींचती है

ये मुझे नींद में चलने की जो बीमारी है
मुझ को इक ख़्वाब-सरा अपनी तरफ़ खींचती है

मुझे दरिया से नहीं है कोई लेना-देना
क्यूँ मुझे मौज-ए-बला अपनी तरफ़ खींचती है

खींचती है मुझे रह रह के मोहब्बत उस की
जैसे फ़ानी को फ़ना अपनी तरफ़ खींचती है

मैं हूँ सूरज सा रवाँ रात की जानिब 'शाहिद'
मुझ बरहना को क़बा अपनी तरफ़ खींचती है