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यूँ है तिरी तलाश पे अब तक यक़ीं मुझे | शाही शायरी
yun hai teri talash pe ab tak yaqin mujhe

ग़ज़ल

यूँ है तिरी तलाश पे अब तक यक़ीं मुझे

इफ़्तिख़ार नसीम

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यूँ है तिरी तलाश पे अब तक यक़ीं मुझे
जैसे तू मिल ही जाएगा फिर से कहीं मुझे

मैं ने तो जो भी दिल में था चेहरे पे लिख लिया
तू है कि एक बार भी पढ़ता नहीं मुझे

ढलते ही शाम टूट पड़ा सर पे आसमाँ
फिर मेरा बोझ ले गया ज़ेर-ए-ज़मीं मुझे

ता'बीर जागती हुई आँखों को क्या मिले
इक ख़्वाब भी तो शब ने दिखाया नहीं मुझे

कंदा है मेरा नाम जहाँ आज भी 'नसीम'
पहचानते नहीं उसी घर के मकीं मुझे