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ये ज़रूरत है तो फिर इस को ज़रूरत से न देख | शाही शायरी
ye zarurat hai to phir isko zarurat se na dekh

ग़ज़ल

ये ज़रूरत है तो फिर इस को ज़रूरत से न देख

शाहिद कमाल

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ये ज़रूरत है तो फिर इस को ज़रूरत से न देख
अपनी चाहत को किसी और की चाहत से न देख

तुझ में और मुझ में कोई फ़र्क़ नहीं है लेकिन
तू शराफ़त को मिरी अपनी शराफ़त से न देख

मुझ को हो जाएगी अब मुझ से ही नफ़रत वर्ना
ऐ मिरी जान मुझे इतनी मोहब्बत से न देख

हँस के हर बोझ ज़माने का उठा लेता हूँ
मैं हूँ मज़दूर मुझे इतनी हिक़ारत से न देख

हम-नशीनी का शरफ़ सब को कहाँ मिलता है
तेरे पहलू में जो बैठा हूँ तो हैरत से न देख

हुस्न-बीनी के भी आदाब हुआ करते हैं
उस के चेहरे की तरफ़ इतनी जसारत से न देख

उस से माँगा है कहाँ मैं ने कोई हर्फ़-ए-क़िसास
मेरे क़ातिल से ये कह मुझ को नदामत से न देख