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ये तो नहीं कि तुम से मोहब्बत नहीं मुझे | शाही शायरी
ye to nahin ki tum se mohabbat nahin mujhe

ग़ज़ल

ये तो नहीं कि तुम से मोहब्बत नहीं मुझे

एहसान दानिश

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ये तो नहीं कि तुम से मोहब्बत नहीं मुझे
इतना ज़रूर है कि शिकायत नहीं मुझे

मैं हूँ कि इश्तियाक़ में सर-ता-क़दम नज़र
वो हैं कि इक नज़र की इजाज़त नहीं मुझे

आज़ादी-ए-गुनाह की हसरत के साथ साथ
आज़ादी-ए-ख़याल की जुरअत नहीं मुझे

दूभर है गरचे जौर‌‌‌‌-ए-अज़ीज़ाँ से ज़िंदगी
लेकिन ख़ुदा-गवाह शिकायत नहीं मुझे

जिस का गुरेज़ शर्त हो तक़रीब-ए-दीद में
इस होश इस नज़र की ज़रूरत नहीं मुझे

जो कुछ गुज़र रही है ग़नीमत है हम-नशीं
अब ज़िंदगी पे ग़ौर की फ़ुर्सत नहीं मुझे

मैं क्यूँ किसी के अहद-ए-वफ़ा का यक़ीं करूँ
इतनी शदीद ग़म की ज़रूरत नहीं मुझे

सज्दे मिरे ख़याल-ए-जज़ा से हैं मावरा
मक़्सूद बंदगी से तिजारत नहीं मुझे

मैं और दे सकूँ न तिरे ग़म को ज़िंदगी
ऐसी तो ज़िंदगी से मोहब्बत नहीं मुझे

'एहसान' कौन मुझ से सिवा है मिरा अदू
अपने सिवा किसी से शिकायत नहीं मुझे