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ये सोच कर न माइल-ए-फ़रियाद हम हुए | शाही शायरी
ye soch kar na mail-e-fariyaad hum hue

ग़ज़ल

ये सोच कर न माइल-ए-फ़रियाद हम हुए

हबीब जालिब

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ये सोच कर न माइल-ए-फ़रियाद हम हुए
आबाद कब हुए थे कि बर्बाद हम हुए

होता है शाद-काम यहाँ कौन बा-ज़मीर
नाशाद हम हुए तो बहुत शाद हम हुए

परवेज़ के जलाल से टकराए हम भी हैं
ये और बात है कि न फ़रहाद हम हुए

कुछ ऐसे भा गए हमें दुनिया के दर्द-ओ-ग़म
कू-ए-बुताँ में भूली हुई याद हम हुए

'जालिब' तमाम उम्र हमें ये गुमाँ रहा
उस ज़ुल्फ़ के ख़याल से आज़ाद हम हुए