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ये सिलसिला-ए-शाम-ओ-सहर यूँही नहीं है | शाही शायरी
ye silsila-e-sham-o-sahar yunhi nahin hai

ग़ज़ल

ये सिलसिला-ए-शाम-ओ-सहर यूँही नहीं है

रूही कंजाही

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ये सिलसिला-ए-शाम-ओ-सहर यूँही नहीं है
हर क़ाफ़िला सरगर्म-ए-सफ़र यूँही नहीं है

हंगामे बपा करती है हर आन तिरी याद
पुर-शोर दिल-ओ-जाँ का नगर यूँही नहीं है

तारीख़ सुना सकती है सदियों के सफ़र की
ये गर्द सर-ए-राहगुज़र यूँही नहीं है

उभरेगा यक़ीनन कोई दम में कोई सूरज
बेताबी-ए-अर्बाब-ए-नज़र यूँही नहीं है

मंज़िल भी कोई ख़ास मिलेगी हमें 'रूही'
दुश्वार से दुश्वार सफ़र यूँही नहीं है