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ये शब तो क्या सहर को भी शायद नहीं पता | शाही शायरी
ye shab to kya sahar ko bhi shayad nahin pata

ग़ज़ल

ये शब तो क्या सहर को भी शायद नहीं पता

प्रेम वारबर्टनी

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ये शब तो क्या सहर को भी शायद नहीं पता
मैं आख़िरी चराग़ हूँ सूरज के शहर का

बज़्म-ए-सुकूत-ए-दिल में है हलचल मची हुई
सारंगियाँ हैं किस के बदन की ग़ज़ल-सरा

मेरी बयाज़-ए-दर्द वो पढ़ कर बहुत हँसे
था नाम जिन का पहले वरक़ पर लिखा हुआ

देखा अजीब ख़्वाब अमावस की रात ने
हम चल रहे थे चाँद पे दोनों बरहना-पा

शोलों के हाथ थे कि ठिठुरते चले गए
फिर बर्फ़ का लिबास किसी ने पहन लिया

सोने की तश्तरी में सजा कर न फूल भेज
ये खेल मुझ ग़रीब से देखा न जाएगा

ख़ुशबू के ख़्वाब में न ढली ज़िंदगी मगर
चंदन की लकड़ियों से जलाना मिरी चिता

काग़ज़ की नाव आग के दरिया में डाल दी
क्या जाने और चाहती क्या है तिरी अना

ऐ दोस्त इस क़दर भी अकेला कोई न हो
मैं ख़ुद भी अपने साथ नहीं दूसरा तो क्या

ऐ 'प्रेम' यूँ तो धूम थी सारे जहान में
अपने ही घर में कोई हमें पूछता न था