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ये सर-ब-मोहर बोतलें हैं जो शराब की | शाही शायरी
ye sar-ba-mohr botalen hain jo sharab ki

ग़ज़ल

ये सर-ब-मोहर बोतलें हैं जो शराब की

रियाज़ ख़ैराबादी

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ये सर-ब-मोहर बोतलें हैं जो शराब की
रातें हैं उन में बंद हमारी शबाब की

पूछो न हम से आलम-ए-ग़फ़लत के ख़्वाब की
दुनिया कुछ और ही थी हमारे शबाब की

ये नश्शा आँख देख के उस मस्त ख़्वाब की
जैसे अभी चढ़ाई हो बोतल शराब की

सुर्ख़ी शफ़क़ की शक्ल मह-ओ-आफ़्ताब की
छलकी हुई शराब है जाम-ओ-शराब की

क्यूँ टूटती हैं बिजलियों पर आज बिजलियाँ
शायद गिरह खुली तिरे बंद-ए-नक़ाब की

मीना-ओ-जाम देख के ख़ुश होगा मोहतसिब
समझेगा वो खिली हुई कलियाँ गुलाब की

थी सर-ब-मोहर फूट गई अपने ज़ोर में
तौबा से पहले टूटी है बोतल शराब की

शरमा गईं जो बोसा-ए-लब बाग़ में लिया
सिमटी हैं क्या खिली हुई कलियाँ गुलाब की

हम ने तमाम उम्र में कितनी शराब पी
शायद बता सके हमें मीज़ाँ हिसाब की

चेहरे का रंग देख लो तुम रख के आइना
बोसे से दौड़ जाएगी सुर्ख़ी शहाब की

महफ़िल में पी जो फूल तो इस एहतियात से
मीना-ए-मय ने बू न कभी दी शराब की

ऐ कसरत-ए-गुनाह तिरे डर से दब गई
देखा मुझे कि झुक गई मीज़ाँ हिसाब की

ज़र्रा हवा में भर के बना आदमी की शक्ल
क़तरा हवा में भर के है सूरत हबाब की

चक्कर हवा ने इतने दिए हैं कि गर्द-ए-बाद
तस्वीर बन गया है मिरे पेच-ओ-ताब की

साए से उस की ज़ुल्फ़ के बिन्त-ए-इनब को क्या
बन कर परी उड़ेगी ये बोतल शराब की

ये कह के कल दिखाए उन्हें पारा-ए-जिगर
बिखरी हुई ये पंखुड़ियाँ हैं गुलाब की

हर शाम साथ लाती है इक चौदहवीं का चाँद
क्या जानें क्या करेंगी ये रातें शबाब की

कम-बख़्त ने शराब का ज़िक्र इस क़दर किया
वाइज़ के मुँह से आने लगी बू शराब की

दो घूँट पर शराब के है हस्र ज़िंदगी
रातें शबाब की हैं न बातें शबाब की

काम आएगी 'रियाज़' के मश्क़-ए-तवाफ़-ए-ख़ुम
काबे के गिर्द होंगे जो सूझी सवाब की