EN اردو
ये रुख़-ए-यार नहीं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ के तले | शाही शायरी
ye ruKH-e-yar nahin zulf-e-pareshan ke tale

ग़ज़ल

ये रुख़-ए-यार नहीं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ के तले

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

;

ये रुख़-ए-यार नहीं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ के तले
है निहाँ सुब्ह-ए-वतन शाम-ए-ग़रीबाँ के तले

क्या करें सीना जो नासेह से छुपाते न फिरें
दाग़ से दाग़ हैं कुछ अपने गरेबाँ के तले

आह की बर्क़ जो सीने में चमकती देखी
तिफ़्ल-ए-अश्क आ ही छुपे दामन-ए-मिज़्गाँ के तले

दिल में आता है करूँ ऐ गुल-ए-ख़ंदाँ तुझ बिन
बैठ कर गिर्या किसी नख़्ल-ए-गुलिस्ताँ के तले

यूँ निहाँ दाग़-ए-जिगर आह से रखता हूँ कि जूँ
बाद से शम्अ छुपावे कोई दामाँ के तले

शैख़ डरता हूँ कहीं बैठ न जावे ये कुआँ
मत खड़ा हो तू असा रख के ज़नख़दाँ के तले

नहीं मिलने की 'बक़ा' हम को ब-जुज़ कुंज-ए-मज़ार
जा-ए-आसूदगी इस गुम्बद-ए-गर्दां के तले