ये क्या बताएँ कि किस रहगुज़र की गर्द हुए
हम ऐसे लोग ख़ुद अपने सफ़र की गर्द हुए
नजात यूँ भी बिखरने के कर्ब से न मिली
हुए जो आइना सब की नज़र की गर्द हुए
ये किन दुखों ने चम-ओ-ख़म तमाम छीन लिया
शुआ-ए-महर से हम भी शरर की गर्द हुए
सब अपने अपने उफ़ुक़ पर चमक के थोड़ी देर
मुझे तो दामन-ए-शाम-ओ-सहर की गर्द हुए
पुकारो कह के हमें छाँव जी न बहलेगा
बचे जो धूप से पा-ए-शजर की गर्द हुए
हमें भी बोलना आता है फिर भी हैं ख़ामोश
कि हम तिरे सुख़न-ए-मुख़्तसर की गर्द हुए
धुला सा चेहरा भी कुछ माँद पड़ गया आख़िर
हुए न अश्क तिरी चश्म-ए-तर की गर्द हुए
शरीर-ओ-तुंद हवा थी कि रौ मआ'नी की
तमाम लफ़्ज़ लब-ए-मो'तबर की गर्द हुए
ये राह कितनी पुर-आशोब है 'फ़ज़ा' न कहो
क़लम की राह चले हम हुनर की गर्द हुए
ग़ज़ल
ये क्या बताएँ कि किस रहगुज़र की गर्द हुए
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

