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ये क्या बताएँ कि किस रहगुज़र की गर्द हुए | शाही शायरी
ye kya bataen ki kis rahguzar ki gard hue

ग़ज़ल

ये क्या बताएँ कि किस रहगुज़र की गर्द हुए

फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी

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ये क्या बताएँ कि किस रहगुज़र की गर्द हुए
हम ऐसे लोग ख़ुद अपने सफ़र की गर्द हुए

नजात यूँ भी बिखरने के कर्ब से न मिली
हुए जो आइना सब की नज़र की गर्द हुए

ये किन दुखों ने चम-ओ-ख़म तमाम छीन लिया
शुआ-ए-महर से हम भी शरर की गर्द हुए

सब अपने अपने उफ़ुक़ पर चमक के थोड़ी देर
मुझे तो दामन-ए-शाम-ओ-सहर की गर्द हुए

पुकारो कह के हमें छाँव जी न बहलेगा
बचे जो धूप से पा-ए-शजर की गर्द हुए

हमें भी बोलना आता है फिर भी हैं ख़ामोश
कि हम तिरे सुख़न-ए-मुख़्तसर की गर्द हुए

धुला सा चेहरा भी कुछ माँद पड़ गया आख़िर
हुए न अश्क तिरी चश्म-ए-तर की गर्द हुए

शरीर-ओ-तुंद हवा थी कि रौ मआ'नी की
तमाम लफ़्ज़ लब-ए-मो'तबर की गर्द हुए

ये राह कितनी पुर-आशोब है 'फ़ज़ा' न कहो
क़लम की राह चले हम हुनर की गर्द हुए