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ये खेत सब्ज़ा शजर रहगुज़ार सन्नाटा | शाही शायरी
ye khet sabza shajar rahguzar sannaTa

ग़ज़ल

ये खेत सब्ज़ा शजर रहगुज़ार सन्नाटा

क़मर सिद्दीक़ी

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ये खेत सब्ज़ा शजर रहगुज़ार सन्नाटा
उगा है दूर तलक बे-शुमार सन्नाटा

हमारे ख़्वाब कोई और देख लेता है
हमारी आँख ख़ला इंतिज़ार सन्नाटा

वो कुश्ता-ए-रह-ए-सौत-ओ-सदा हुआ शायद
वो एक लफ़्ज़ था जिस का हिसार सन्नाटा

है लफ़्ज़ लफ़्ज़ में बुझते मकालमों का धुआँ
सुकूत-ए-इश्क़ है या बे-क़रार सन्नाटा

कभी तो छेड़ कोई साज़ कोई नग़्मा-ए-जाँ
कभी तो अपने बदन से उतार सन्नाटा