ये कौन सा परवाना मुआ जल के लगन में
हैरत से जो है शम्अ की अंगुश्त दहन में
कहते हैं उसे चाह-ए-ज़नख़दाँ ग़लती से
बोसे का निशाँ है ये तिरे सेब-ए-ज़क़न में
वो आइना-तन आइना फिर किस लिए देखे
जो देख ले मुँह अपना हर इक उ'ज़्व-ए-बदन में
वो सुबह को इस डर से नहीं बाम पर आता
नामा न कोई बाँध दे सूरज की किरन में
मज़मूँ नहीं लिखते हम उसे दाग़-ए-जिगर का
रख देते हैं लाले की कली ख़त की शिकन में
ये गर्द-ए-कुदूरत से पस-ए-मर्ग था दिल साफ़
धब्बा न लगा ख़ाक का भी मेरे कफ़न में
ज़िंदाँ में असीरों से ये कहता था मह-ए-मिस्र
ग़ुर्बत ही में आराम मिला और न वतन में
ग़ज़ल
ये कौन सा परवाना मुआ जल के लगन में
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल

