EN اردو
ये कैसी सरगोशी-ए-अज़ल साज़-ए-दिल के पर्दे हिला रही है | शाही शायरी
ye kaisi sargoshi-e-azal saz-e-dil ke parde hila rahi hai

ग़ज़ल

ये कैसी सरगोशी-ए-अज़ल साज़-ए-दिल के पर्दे हिला रही है

अब्दुल हमीद अदम

;

ये कैसी सरगोशी-ए-अज़ल साज़-ए-दिल के पर्दे हिला रही है
मिरी समाअत खनक रही है कि तेरी आवाज़ आ रही है

हवादिस-ए-रोज़गार मेरी ख़ुशी से क्या इंतिक़ाम लेंगे
कि ज़िंदगी वो हसीन ज़िद है कि बे-सबब मुस्कुरा रही है

तिरा तबस्सुम फ़रोग़-ए-हस्ती तिरी नज़र ए'तिबार-ए-मस्ती
बहार इक़रार कर रही है शराब ईमान ला रही है

फ़साना-ख़्वाँ देखना शब-ए-ज़िंदगी का अंजाम तो नहीं है
कि शम्अ के साथ रफ़्ता रफ़्ता मुझे भी कुछ नींद आ रही है

अगर कोई ख़ास चीज़ होती तो ख़ैर दामन भिगो भी लेते
शराब से तो बहुत पुराने मज़ाक़ की बास आ रही है

ख़िरद के टूटे हुए सितारे 'अदम' कहाँ तक चराग़ बनते
जुनूँ की रौशन रविश है आख़िर दिलों को रस्ते दिखा रही है