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ये कह गया बुत-ए-ना-आश्ना सुना के मुझे | शाही शायरी
ye kah gaya but-e-na-ashna suna ke mujhe

ग़ज़ल

ये कह गया बुत-ए-ना-आश्ना सुना के मुझे

जलील मानिकपूरी

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ये कह गया बुत-ए-ना-आश्ना सुना के मुझे
कि आप में नहीं रहता है कोई पा के मुझे

नक़ाब कहती है मैं पर्दा-ए-क़यामत हूँ
अगर यक़ीन न हो देख लो उठा के मुझे

मिलूँगा ख़ाक में आँसू की तरह याद रहे
मिलो न आँख कहीं आँख से गिरा के मुझे

अदा से खींच रहा है कमाँ वो तीर-अंदाज़
क़ज़ा पुकार रही है ज़रा बचा के मुझे

तुम्हारे वास्ते इस दिल का मोल ही क्या है
अदा से देख लो इक दिन नज़र उठा के मुझे

तिरे हिसाब में तेरी क़बा का दामन हूँ
कि जब मिज़ाज में आया चला लुटा के मुझे

मैं डर रहा हूँ तुम्हारी नशीली आँखों से
कि लूट लें न किसी रोज़ कुछ पिला के मुझे

बुलंद नाम न होगा सितम-शिआरी से
तुम आसमान न हो जाओगे सता के मुझे

बुतों को ताकते गुज़री है शर्म आएगी
'जलील' ले न चलो सामने ख़ुदा के मुझे