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ये काफ़िर बुत जिन्हें दावा है दुनिया में ख़ुदाई का | शाही शायरी
ye kafir but jinhen dawa hai duniya mein KHudai ka

ग़ज़ल

ये काफ़िर बुत जिन्हें दावा है दुनिया में ख़ुदाई का

रियाज़ ख़ैराबादी

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ये काफ़िर बुत जिन्हें दावा है दुनिया में ख़ुदाई का
मिलें महशर में मुझ आसी को सदक़ा किबरियाई का

ये मुझ से सख़्त-जाँ पर शौक़ ख़ंजर-आज़माई का
ख़ुदा-हाफ़िज़ मिरे क़ातिल तिरी नाज़ुक कलाई का

न हो पहलू में मेरे दिल तो कोई बात क्यूँ पूछे
यही तो इक ज़रीया है हसीनों तक रसाई का

तुम अच्छे ग़ैर अच्छा ग़ैर की तक़दीर भी अच्छी
ये आख़िर ज़िक्र क्यूँ है मेरी क़िस्मत की बुराई का

वो क्या सोएँगे ग़ाफ़िल हो के शब भर मरे पहलू में
उन्हें ये फ़िक्र है निकले कोई पहलू लड़ाई का

हज़ारों दीदा-ओ-दिल-ए-बाम लाखों तूर से बढ़ कर
करोड़ों जल्वा-गाहें शौक़ तो हो ख़ुद-नुमाई का

क़फ़स में अब कहाँ वो इम्बिसात-ए-सुब्ह-ए-आज़ादी
चमन तक लुत्फ़ था सय्याद मेरी ख़ुश-नवाई का

इशारे पर तिरे चल कर ये लाए रंग मुश्किल है
अभी मोहताज है ख़ंजर तिरे दस्त-ए-हिनाई का

कोई क्या जाए जन्नत में कि उस ने तूल खींचा है
क़यामत पर भी साया पड़ गया रोज़-ए-जुदाई का

वो दिन भी आए हम हों और गलियाँ हों मदीने की
गदायाना सदा हो हाथ में कासा गदाई का

बनाई क्या बुरी गत मय-कदे में बादा-नोशों ने
'रियाज़' आए थे कल जामा पहन कर पारसाई का