ये इश्क़ की गलियाँ जिन में हम किस किस आलम में आए गए
कहती हैं कि हज़रत अब कैसे तुम आज यहाँ क्यूँ पाए गए
इक शर्त है याँ ख़ुशबू-ए-वफ़ा याद आए तो करना याद ज़रा
जब तुम पे भरोसा था गुल का क्या महके क्या महकाए गए
है ये वही लौह-ए-बाब-ए-जुनूँ लिक्खा है न पूछो क्या और क्यूँ
तुम लाए कलीद-ए-जज़्ब-ए-दरूँ और सब मंज़र दिखलाए गए
इक तख़्त-ए-रवान-ए-शेर आया कुछ शाह-ए-सुख़न न फ़रमाया
फिर ताज-ए-तरन्नुम पहनाया और ग़ज़लों में तुलवाए गए
इक तब-ए-रसा से क्या बनता ये उन गलियों का सदक़ा था
वो लफ़्ज़ और वो उस्लूब मिले और वो मा'नी सजवाए गए
हैरत से ठहर जाती थी यहाँ ये कहती हुई हर काहकशाँ
जब यूँ मिल जाना मुमकिन है तो फिर हम क्यूँ फैलाए गए
दुनिया के सही अंदाज़ बहुत उन गलियों के भी हैं राज़ बहुत
जो ठहरे वो सर-अफ़राज़ हुए जो निकले वो ठुकराए गए
ग़ज़ल
ये इश्क़ की गलियाँ जिन में हम किस किस आलम में आए गए
जमीलुद्दीन आली

