ये इश्क़-ए-ना-मुराद भी किस गुमरही में है
खिड़की में जो कभी था वो चेहरा गली में है
हर सुब्ह छेड़ती हैं हवाओं की उँगलियाँ
पोशीदा एक फूल जो नन्ही कली में है
जैसे हर एक अंग है आँखें लिए हुए
क्या तुर्फ़ा एहतियात तिरी सादगी में है
नाकाम ज़िंदगी हो कि नाकाम इश्क़ हो
जीने की आरज़ू तो मिरी जाँ सभी में है
ज़रदार-ओ-हुकमरान में इंसाँ का एहतिराम
अगली सदी में था न ये अब की सदी में है
तुझ से बिछड़ के सब की नज़र में रहेगा क्या
अब तक तो ये 'शकील' तिरी रौशनी में है
ग़ज़ल
ये इश्क़-ए-ना-मुराद भी किस गुमरही में है
अतहर शकील

