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ये है मय-कदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है | शाही शायरी
ye hai mai-kada yahan rind hain yahan sab ka saqi imam hai

ग़ज़ल

ये है मय-कदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है

जिगर मुरादाबादी

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ये है मय-कदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है
ये हरम नहीं है ऐ शैख़ जी यहाँ पारसाई हराम है

जो ज़रा सी पी के बहक गया उसे मय-कदे से निकाल दो
यहाँ तंग-नज़र का गुज़र नहीं यहाँ अहल-ए-ज़र्फ़ का काम है

कोई मस्त है कोई तिश्ना-लब तो किसी के हाथ में जाम है
मगर इस पे कोई करे भी क्या ये तो मय-कदे का निज़ाम है

ये जनाब-ए-शैख़ का फ़ल्सफ़ा है अजीब सारे जहान से
जो वहाँ पियो तो हलाल है जो यहाँ पियो तो हराम है

इसी काएनात में ऐ 'जिगर' कोई इंक़लाब उठेगा फिर
कि बुलंद हो के भी आदमी अभी ख़्वाहिशों का ग़ुलाम है